कसूर बस इतना है मेरा कि,
तुझे खुद से भी ज्यादा चाहा था...
हमने जिन्हें अपना समझा,
उन्होंने हमें अपना कभी समझा ही नहीं.
जिंदा हूं बस दुनिया की नजरो में,
वैसे मर तो कब का चुका हूं...
मेरी मोहब्बत की मैयत तो उसी दिन निकल गई थी,
जब तूने अपने आशिक से मेरे क़त्ल की साजिश की थी..
तू मेरी है दिल तो यही कहता है,
पर है तो नहीं तू मेरी..
दुनिया कहती है तू मेरी है,
पर कैसे बताऊं मैं दुनिया को तू मेरी नहीं किसी और की है...
वो खुश है मेरे अरमानों का क़त्ल करके,
मिली तो इस तरह से थी कि तू,
जैसे मेरे हाथ की रेखाओं मैं तुझे लिखा होगा..
मैं ठहर तो जाता,
पर किसी ने रोका ही नहीं..
अब ना ही तुझसे उम्मीद है,
और ना ही तेरे आने की आस है।...

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